Wednesday, 2 May 2012

कीर्तिशेष कविवर विमल राजस्थानी उर्फ पुरुषोत्तम प्रियदर्शी


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वासवदत्ता  को काव्यकार ने सर्गों में विभक्त किया हैI मथुरा की नगरवधू वासवदत्ता और
'
उप्दुप्त' की इस कथा-काब्य की अवधी भगवान बुद्ध  के महाप्रयाण  के लगभग १००
 
बर्षों के बाद, ३८३ इसवी पूर्व चर्चित हैI

इंगितिका
सौंदर्य अतीतकाल से मानव-मन को सम्मोहित करता आ रहा हैl
इसी की मनोरम सृष्टियाँ रंभा, मेनका, उर्वशी, पद्मनी, एफ्रोडाइट, हेलन आदि हैंl
विश्वकवि रविन्द्रनाथ ठाकुर ने उर्वशी का अवतरण करते हुए- नहो माता, नहो कन्या, नहो वधू-कह कर उसकी अनोखी अवस्थिति दिखलाई परन्तु, सभी के प्रसंग में एक न एक आख्यान रचे ही गएl          
इसी की अगली कड़ी यदि वासवदत्ता  को मान लिया जायगा तो कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिएl
परन्तु, यह वासवदत्ता -उद्यान की वासवदत्ता  नहीं-उत्तर बुद्ध-युग के मथुरा नगर की एक विलक्षण रूपा-जीवा है जो नारी के अंतर्मन की अन्ध  गुहाओं में एक नन्हा टिमटिमाता दीप जलाये रखती है- और इस अर्थ में वासवदत्ता चिरन्तन हैl
रहा उस चिरन्तन को शब्दों, छंदों में ढालने का मेरा प्रयास-तो वे मेरे अपने हैंl
नए नहीं, पुराने हैं-परन्तु, यह वासवदत्ता भी तो पुरानी ही हैl
अस्तुl
विमल राजस्थानी
बेतिया (बिहार)
कार्तिक- ‘धन तेरस’- १९९९ (कवी-श्रेष्ट का ७८ वाँ जन्मोत्सव के सुअवसर पर प्रकाशित)
*रचना-पूर्ति मात्र ७५ दिन     

पात्र-परिचय
नृपति-       तत्कालीन यदुवंशी मथुरा नरेशl
मदलसा-     अवकाश-प्राप्ति के सन्निकट पहुंची मथुरा की अगर-वधूl
वासवदत्ता -   मथुरा की नवनिर्वाचित विश्व सुंदरी नगर वधूl
सुनयना-     वासवदत्ता की प्रधान अन्तर्ग सखी-दासीl
श्रेष्ठी-       सुगंधों के सुप्रशिद्ध धन-कुबेर क्व्यापारीl
शाणकवासी-  स्वयं भगवन बुद्ध द्वारा दीक्षा प्राप्त, दीर्धजीवी सिद्ध बौद्ध भिक्षु तथा उप्दुप्त के आध्यात्मिक गुरुl
उपगुप्त-     श्रेष्ठी के तीसरे पुत्र, बौद्ध भिक्छु सिद्ध पुरुष अलक्षण बुद्धl
मूर्तिकार-     भगवान परशुराम द्वारा बसाये गए कोंकण प्रदेश का विश्वविख्यात शिल्पीl

वाणी-वंदना

आशासु राशेभवदङग्वल्ली
भासैव दासिकृतदुग्ध्यसिन्धुम्l
मन् स्मितैनिर्न्दित शार्देंदुं
वंदेऽरविन्दासन सुन्दरित्वाम्ll

  स्वगत
घूर्णित प्रश्न कई अन्तर में, उत्तर कौन कहेगा
इतना सारा बोझ हृदय यह कब तक और सहेगा

है मनुष्य ऐसा धरती पर कहाँ, जहाँ मैं जाऊँ
इन प्रश्नों के चक्रव्यूह से कैसे बाहर आऊँ

ईश्वर हो तुम, तुमने ही तो यह जंजाल रचा है
इसी तथ्य में पगी-पगी वेदों की अमृत ऋचा है

पूछ रहा हूँ तुमसे, तुमको उत्तर देना होगा
जनक बने हो तो दायित्व तूम्हीं को लेना होगा

एक ओर वासव को तुमने रचा कोष कर रीता
उसे बना कर भेजा तुमने जलता हुआ पलीता

अपने ही हाथों तुम ने उसका छवि रूप सँवारा
उमडा् सिन्धु वासनाओं का, बही प्रेम की धारा

प्रखर धृणा का वेग, किया विद्रूप उसी ललना को
प्रश्रय दिया मनुज के मन में प्रतिहिंसा, छलना को

कल तक जिस भू पर बहती थी मनुज प्रेम की धारा
वही धरा बन गयी मनुज के लिए तप्त अंगारा

बिखर गया ऐश्वर्य, रेट का महल ढ्ह गया ऐसे
एक निमिष में अन्जाली-जल-सा सिन्धु बह गया जैसे

तालमेल कथनी-करनी में ढूँढ नहीं पाता हूँ
अथ से इति तक, इति से अथ तक लौट-लौट आता हूँ

कहीं धृणा का घोष, तो कहीं पृति-प्यार बजते हैं
क्रन्दन कहीं, यज्ञ-वेदी पर कलश कहीं सजते हैं

कहीं अहम् का अन्धकार है, कहीं विनय झुकता है
कहीं स्वयम की तुष्टि-हेतु पल-पल मानव
 चुकता है
हीन समझ, मानव पर मानव धन  सा छा जाता है
जहाँ चाहिए अश्रु, वहीं अंगारे बरसाता है
स्वार्थ, स्वार्थ रे! स्वार्थ, स्वार्थ ही घर-बाहर बजता है
धन-पशु हो या रंक, अंतमें, बाँसों पर सजता है

दो गज धरती, शुष्क लकडि्यों की छोटी-सी ढेंरी
शाश्वत सच्चाई है, फिर भी- यह तेरी, वह मेरी

छोटे- से जीवन में कितने खेल खेलने होते
एक तुम्हारे आगे हाथों के उड्  जाते तोते

नहीं तुम्हारे सम्मुख महाबली का वश चलता है
नहीं नियाम टूटते, सूर्य पश्चिम में ही ढलता है

क्यों निर्दोष दंड पाता है, दोषी बच जाता है  
क्यों अलभ्य की प्राप्ति हेतु मनाव-मन अकुलाता है

सीमित क्यों असीम होता है, बल किससे पाता है
स्वयं मुक्त हो, अन्यों को भी साथ खींच लाता है

सुख-दुःख की यह आँख मिचौनी क्यों चलती रहती है
स्नेह-विहीन दीप की बाती क्यों बलती रहती है

कही श्रवण-सा पुत्र, कहीं दानव सूत के चोले में
गृह-लक्ष्मी है कहीं, कर्कशा बैठ गयी डोले में

नर्क बना देती कटुंब को, खंड-खंड करती है
आग लगा देती है सुख में, पग ज्यों ही धरती है

बंधू पतित होतेकन्याओं पर कुदृष्टि रखते हैं
मन के कुटिल, कुचक्री, ऊपर से सुभद्रा दीखते हैं

जीवन- मूल्यों का, द्रुतगति से, ह्रास हो रहा क्यों है
अपना शव अपने कंधो पर मनुज ढ़ो रहा क्यों है

सेवा करने की यह देखो होड़ लगी कैसी है
जन-सेवाक की वृत्ति हीन धन-पशु दानव जैसी है

शक्ति और धन के पीछे क्यों अंधी  दौड़ लगी है
अंधकार सर्वत्र, ज्ञान की विभा न कहीं जगी है     
   
संस्कृति सुबक रहीक्रन्दन करती सभ्यता हमारी
एक-एक कर, लुटी जा रहीं हैं क्यों निधियाँ सारी

क्यों ऐसी बातें होती हैं, क्यों भविष्य  में  होगी
दोगे उत्तर? क्यों सिरजे ये योगी और वियोगी

रचना बहुत विचित्र, अटपटी, समझ नहीं पाता हूँ
फिर भी मैं जाने क्यों "वासव" का चरित्र गाता हूँ
  
                

              
सर्ग-

मथुरा

रस-राग-धरा, मधु भरा कण-कण में
मन रमा-रमा , तन थमा वेणु के स्वन में
कवि पुलाक-किलाक वज्र-कण-वंदन करता है
प्रभु-चरण-चुम्बिता राज सर पर धरता है
अयि देव-निर्मिता मथुरे! तेरी जय हो
स्मरण-मात्र  से पाप मनुज के  छय हों

चर्मोत्कर्स कलाओं का ऐसा  अन्यत्र नहीं है
यदि है स्वर्ग कही तो सचमुच वह बस, यहीं, यहीं है

अक्षय वट-सी पुण्य-पूज व्रज-भूमि, स्वर्ग से सुन्दर
जिसकी राज मस्तक पैर धर तर जाते सुर-नारी-नर

योगेश्वर की जन्म-भूमि, सौभाग्य प्रसून खिला है
शत-सहस्त्र स्वर्गों से भी ऊँचा स्थान मिला है

घुटनों के बल चले ब्रह्म, यमुना पद-ताल धोती है
वंदन करते त्रिदेव, देवियाँ प्रणत होती हैं          

धन्य यहाँ के गिरी-वन-प्रांतर, धन्य कुँज,पथ, गलियां
कण-का अब भी अमृत-स्वरों में गाते विरुदावलियाँ

मिट्टी के अणु-अणु से मोहल गंध मधुर आती है
मादक वंशी-दवनी एजी-जग को मोहित केर जाती है

मस्तक पर देवता चरण-रज चढ़ा धन्य होते है
विधि-विधि में लोट-लोट तन-मन की सुधि खोते है

यह पावन यमुना का तट, मथुरा निहारती जल में
ऐसा अनुपम तीर्थ नहीं कोई भी भूतल में

कारागार! तुम्हारे प्रस्तर-खंड भाग्यशाली हैं
जिनने अनायास ईश्वर की शिशु-झाँकी पा ली है

कंस यदि नहीं दुराचार की सीमा लाँघा करते
कैसे क्षीर-सिंधु-वासी प्रभु पृथ्वी पैर पग धरते

जब-जब है देखते ईश-अन्याय धारा पैर होता
तब-तब युग त्रेता होता, तब-तब युग द्वापर होता

अपना दूत विशेष धरा पैर प्रथम भेज देतें हैं
अनाचार को तीव्र बना जो अमित तेज देते हैं

पराकाष्ठा पैर पहुँचा देते जब कुटिल अन्य को
स्वामी का आदेश, असीमित केर देते जन-भय को

सब के मिलित पाप से दबी धरा डोला करती है
नियति सुकाल-कपट-अर्गला तब खोला करती है

कंपित हो आकाश सिसकता, अवनी विलख रोती है
मनुज-रूप ईश्वर की तब नारी जननी होती है  

लीला-धाम बना जग को, प्रभु त्राण दिला देते हैं
दूत भक्त को, अपने हाथों, अमृत पीला देते हैं

निज कर्तव्य निभा केर सेवक स्वर्ग लौट जाता है
युग-युग से इस धारा-धाम पैर यही दृश्य आता है

बीते कोटि कल्प पैर अब भी घृणा-भर ढ़ोते हैं
प्रभु पद-सेवा-लीन, सहन की शक्ति कहाँ खोते हैं

राम और रावण के ‘रा’-रहस्य को किसने जाना
कंस, कन्हैया के ‘क’-भेद को कब जग ने पहचाना

जो ज्ञानी-ध्यानी हैं वे ही समझ इसे पते हैं
‘रा’-‘क’ के राका-रहस्य पैर झूम-झूम जाते हैं

यह योंही होता न, सुनिश्चित यह विधान है विधि का
गोपनीय कुछ छिपा हुआ है आशय करूणानिधि का

अस्तु, कंस! तुम धन्य, त्राण के सूत्रधार बने तुम
वंशीवाले की मधु-लीला का जयकार बने तुम

तुम प्रणम्य  हो, तुम नमस्य हो, तुम निम्मित हो जय के
प्रभु-इक्छा से ही होते पार्षद अवतार अनय के

साधुवाद ओ कंस! धारा को धाम बनाया तुमने
लीला-धाम बना केर वज्र को, पुण्य कमाया तुमने

प्रभु के हाथों मरण वरण केर बने मोक्ष-अधिकारी
युग-युग तक स्मरण रखेंगे सुर-किनार, नर-नारी    
 
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प्रबल प्रतापी भूप, राजधानी मथुरा अति सुन्दर
भव्य-दिव्य प्रासाद, खिले ज्यों धरती पैर इन्दीवर

चिकने, धुल-विहीन, स्वच्छपथ,चम-चम करती गलियाँ
सुन्दर, मनहर गेह, लग रहीं झूठी तारावलिया

द्वार द्वार  पर मणि-मुक्त के वन्दनवार टाँगें हैं
भीति-चित्र दीवारों पैर के विधि ने स्वयम् रंगें हैं

हाट-बाट में श्री-समृद्धि की आभा छिटक रही है
केशर-कस्तूरी, मेवा-मिश्री से पति माहि है

पय, पय- निर्मित भाँति-भाँति के मिष्टानों की ढ़ेरी
रंग-विरंगे फल-फूलों की है भरमार घनेरी

छवि-विचित्र मयूरपुच्छों से, सतरगी वस्त्रों से
जगमग हैं अल्प आयुधों, अस्त्र-शस्त्र से

अभिनव, सुखद विपुल श्रृंगार-प्रसाधन भरे पड़े हैं
हीरे, मणि, मुक्ताओं के कंठे पुखराज जड़े हैं

स्वर्णाभूषण, रत्नों की ढ़ेरियाँ, स्वर्ण-मुद्राएँ
भाँति-भाँति के गंध-द्रव्य, सौरभ से, मत्त बनायें

मूर्तिकार, चल-चित्रकार नैसर्गिक छटा उकेरें
भाँति-भाँति की कला-वस्तुओं के हैं ढ़ेर धनेरे

व्यस्त सभी क्रेता-विक्रेता, हलचल बहुत मची है
सुर-नर किन्नर, क्रेताओं में सुरपति, स्वयम् शची है

अति असीम आनंद हर्ष, उल्लास, विनोद भरा है
मथुरा में जैसे कुबेर का रत्न-कोष बिखरा है

नर-नारी, अमूल्य वस्त्रों से शोभित, सजे-धजे हैं
कोई नहीं कुरूप, लगन से विधि ने सब सिरजे हैं

सभी सुखी-संपन्न, न अर्थाभाव कहीं किंचित है
नहीं एक भी मनुष्य जो सुख-सुविधा-वंचित है

भाव-जगत में भले कष्ट होता, पीड़ा होती हो
प्रिय-वियोग में भले विरहिणी सुबक-सुबक रोती हो

रोग, प्रभाव आयु का, मृत्यु भले कुहराम मचा दे
नियति-चक्र औ’ कल भले मानव को नाच नचा दे

होनी पर तो स्वयम् ब्रह्म का वश नहीं चला है
किन्तु, यहाँ लक्ष्मी न अस्थिर और नहीं चपला है

सजी-सजी युवतियाँ अप्सराओं को लजा रही हैं
पुष्प-गुच्छ-सी हट-बात, धार-आँगन सजा रही है

टिकी त्रिवलियों पैर कचुंकियों की अनमोल धरोहर
पुलक विखेरें गज-गामिनियों के रन-झुं नुपुर-स्वर

बंकिम चितवन युवा-मनों को वेध-वेध जाती है
आकुल आलिंगन करने को गजभर की छाती है

चहुँदिशि शिष्ट विनोद-हास्य के तारों की झंकृति है
इंद्र-धनुष-सी मनोहारिणी मथुरा क संस्कृति है

यमुना-जल में राजमहल की परछाई झलमल है
पंखुरियों पैर रत्न-दीप बाले ज्यो खिला कमाल है

लहर चूमती वृक्षावलियों पैर गंजित कलरव है
खग-कुल-दल का, वृन्त-वृन्त पैर, नृत्य-गन अभिनव है

फुदक-फुदक केर मधुर स्वरों में रवि-वंदन करते हैं
चंचु बदन पैर फेर प्रकृती का अभिनंदन करते हैं

तिन ओर परिखाएँ, जल ऊपर तक भरा-भरा है
एक ओर कालिन्दी का कैशोर्य सहज निखरा है

दस गज ऊँची प्राचीरें हैं, ठौर-ठौर गुम्बद हैं
प्रहरी प्रांशु सजग गर्वीले, शस्त्रागार बृहद हैं

प्राचीरों के भीतर सुन्दर, मनहर कई महल हैं
जिनकी शोभा का वर्णन करना रे! अहि सहल है

पुष्प-वाटिकाओं में झुंड उड़ा करते अलियों के
वन-निकुंज लगते ज्यों दल झलमल तरवालियों के

महलों से कुछ दूर मध्य में सभागार अति सुन्दर
एक सहस्त्र आसनों वाला अति विशाल अभ्यंतर

स्वर्ण-रजत-मंडित, नृप का, सिंहासन अति मनहर है
रत-जड़ित नृप-छत्र, मोतियों की झलमल झालर है

ध्वनि-अवरोधक युक्त, नृपति का चिंतावेश्म, जटिल है
गुप्तद्वार जनसाधारण की आँखों से ओझल है

अनुशासन का ओज व्याप्त है, धर्म-निति छाई है
पद-सेवा ताज, क्षीरोदधि से, रमा उतर आई है

न्यायी राजा के प्रताप, यश की कह रहा कहानी
उठती-गिरती लोल लहरियों में यमुना का पानी

सारा नगर धीरा ऊँची, प्रस्तर की, प्राचीरों से
सिंघद्वार अति भव्य जड़ित मणि-मुक्ताओं, हीरों से

आठों पहर बज रहे मंगलवाद्धय, हर्ष नर्तित है
सुरपुर की नार्तान्शाला-सी गृह-गृह में झंकृत है

चरमोत्कर्ष कलाओं का ऐसा अन्यत्र नहीं है
यदि है स्वर्ग कहीं तो सचमुच वह बस, यहीं, यहीं है

इसी स्वर्ग में राजनर्तकी मदालासा बडभागी
कोटि-कोटि जन जिसके नर्तन-गायन के अनुरागी

जिसका ड़लता यौवन भी मलयज के कोष लुटाए
जड़-चेतन जिसकी छवि-ध्युती पैर बार-बार बलि जाये

हुए एक शत वर्ष बुद्ध को गए, स्मृति टटकी है
इसी काल में विस्मयकारी धटना एक घटी है
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वासवदत्ता
[] शैशव
[] मदालसा
[] इर्ष्या
[] रात्रि-चर्या
वृत्तानुपुर्वे च न चातिदिर्धे जंङधे् शुभे सृष्टवतस्तदीयेl
शेषांङग् निमार्णविधौ विधातुर्लावण्य उत्पाध्य इवास यत्नःll
                         -- कालिदास (कुमार संभव)

शिशु में यह लावण्य! तरुण वे में त्रिलोक डोलेगा
रूप-सिंधु का गर्जन नभ के श्रुति-पट तक बोलेगा

शैशव

देव-कन्या, यक्ष-पुत्री या की कोई किन्नरी है
कौन सध्योजात यह, क्या व्योम से उतरी पारी है

यह किलकती कांति, यह लावण्य, यह सौंदर्य-धारा
स्वर्ण-सा वपु, नयन खंजन से, अलौकिक रूप प्यारा

अरुण पतले होंठ, स्मिति-कोष शत-शत है निछावर
लाल पद-तल औ’ हथेली, रची हो जैसे महावर

चन्द्र को लज्जित करे ऐसा विभासित दिव्य आनन
पुलक रंध्रों में सृजन करते सुगन्धित श्वाँस के स्वन

कौन है, यह कौन, गुंजित प्रश्न, उत्तर कौन देगा?
बालिका अपनी कहे, सौभाग्य ऐसा कौन लेगा?

प्रेम का प्रतिदान अपना कह सके, साहस किसे है?
क्लीव है, यदि प्रेम में प्यारा नहीं अपयश जिसे है

वासना की आग का ही धर्म बस, वह जानता है
सत्य को स्वीकार करने का नहीं हठ ठानत है

घोर लिप्सा, रूप-रस, कौमार्य-सुख की, पालता है
भींच चुटकी में किसी नन्ही कलि को डालता है            

और जब चीत्कार उसकी रूप धर आती धरा पर
रेत का बन कर धरौंदा बिखर जाता भरभरा कर

वासना की वहिन् वाले दृग, धरे कालि हथेली
छोड़ देता है तरि को सिंधु-लहरों पर अकेली

अबस-बेबस तरी, लहरें लीलने को दौड़तीं हैं
तक्षि्काएं फनफना फन फुफ्कारें छोड़तीं हैं

हेरती सुने दृगों से तक्षकों की बम्बियों को
सूप देती पाप प्रिय का शून्य जंगल, झाड़ियों को                
              
किरण, प्रस्नुत-स्तनी की कोख से छिटकी हुई है
शरण भू-नभ पैर , पेर्वशाधर में अटकी हुई है

कौन इस अज्ञात कुल की कलि को पाले-संभाले?
रक्त छाती का पीला कर, क्रोड़ में अपने बिठा ले

यह अशुभ उपहार देवो का की नर की कालिमा है!
या की कुंती-गर्भ जैसी सूर्य की द्युति, लालिमा है!

है अनेकों प्रश्न, नके कौन उत्तर दे सकेगा?
रूप की इस प्रखरता का वेड क्या रोके, रुकेगा?

कौन, इसको कौ मंदिर-देहरी पैर से उठा ले
कौन इस विद्युत-प्रभा को नया की पुतली बना ले   
  
प्रश्न यह सरे नगर पैर मेध-सा मँडरा रहा है
तर्क सारे व्यर्थ, स्तंभित, चकित, जो भी जहाँ है

बात श्रुति-पट तक नृपति के गयी उड़ती-सी अचानक
स्वप्न देखा था नृपति ने रत में कोई भयानक

चित्त था उद्विग्न, फिर भी बात ऐसी ही बड़ी थी
नृपति के सम्मुख उपस्थित एक निर्णायक धड़ी थी

जो निराश्रित है, नहीं जिसका यँहा कोई सहारा
दुखी हो जिसने नियंता को, करूँ स्वर से पुकारा

नृपति प्रतीधि उसी सत्ता का धरा पैर क्या नहीं है?
एक की क्या बात, साडी प्रजा का पालक वही है

जुटे चिंतावेश्म में आमनी, सेनापति, सभासद
प्रश्न था अद्भुत, समस्या थी जटिल-सी वेद्नाप्रद‌
  

व्यक्त की चिंता नृपति ने- ‘कौन है वह अधम पापी!
कौन वह नर-पशु की जो भगा, छिपा मुख, उत्कलापी!!

कल्पना में भी न ऐसा आज तक आया अनय था
सत्य का वर्चस्व शाश्वत, शील मर्यादित अभय था

नहीं मेरे राज्य में ऐसा अनय कौंघा कभी था
मुहँ छिपा कर धर्म यों लेता नन्ही औंधा कभी-था

सह्य मुझको नहीं टिका कलुष की इस कालिमा का
कौन हैं वह क्लीव जिसने है लजाया दुघ माँ का

त्वरित मेरे सामने उसको उपस्थित किया जाए
दंड जिससे क्रूरतम उस ह्रिंश पशु को दिया जाए’

कितु, थी तत्काल सम्मुख शिशु-व्यवस्था की समस्या
दृष्टि नीची किये चिंतित मंत्रियो का अवश-सा

मंत्रणा कुछ और धहरी, नाम सहसा एक दमका
बात सब को भा गयी, धुल-मिल गया मंतव्य सबका

‘एक मात्र मदालसा ही राज्य की जो नर्तकी है
योग्य है इस कार्य के सब भांति, यद्यपि वह थकी है

पर नहीं व्यवधान उसकी आयु पालन में बनेगी
प्यार में उसके निरंतर बालिका निशि-दी सनेगी

वहन होगा राज्य-कोषागार से व्यय-भार सारा’
दिख गया सबको अचानक शून्य नभ में एक तारा

मदालसा

‘हे भगवान! पाप यह किसका मेरे गले पड़ा है!’
झुँझलायी-सी है मदलसा, मन उखड़ा-उखड़ा है

थी मैं चिंता-मुक्त, व्यर्थ का यह कुमार ढ़ोऊँगी
सहज ह्रदय क शांति, शक्ति, सुख-चैन व्यर्थ खौउँगी

किन्तु अटल आदेश नृपति का सर-माथे धरना है
सुख से हो या दुःख से, यह कर्तव्य पूर्ण करना है’

झटपट कर श्रृंगार, चल पड़ी चिंता-युक्त, मन मारे
‘चलूँ, बहाने इसी टेक लुँगी माता प्रभु-द्वारे’
**************************************

हटो-हटो, दो पंथ, भीड़ में महारोर छाया है
राज-नर्तकी मदालसा का रथ असमय आया है

उतरी रथ से मदालसा, पीछे प्रधान दासी है
छिटक रही है रूप-ज्योत्सना ज्यों पूरणमासी है

चाल मदभरी, हाव हठीले, भाव मंदिर मदमाते
सावधान मुद्रा, प्रशांत सब, उसके आते-आते

था यौवन उतार पर, कौशल में कसाव भारी था
तिस वसंत झेलने पर भी रूप मनोहारी था

किन्तु, थक चुकी थी अभिलाषा कीर्ति-भर को ढ़ोते
मन के तार मृदंग-थाप को अब थे नहीं पिरोते

धीरे-धीरे ह्रदय-धरा पर प्रभु-पद-चाप ध्वनित थी
साँसों में अधिकांश देव-चरणों पर बिछी, प्रणत थी

पूजा-भाव प्रगाढ़, देव-दर्शन की उत्सुकता है
देव-देहरी पर आते ही प्रथम शीश झुकता है

ज्योंही शीश उठा की पार्श्व में चंद-किरण-सी चमकी
देखा-लिपटी पड़ी, चाँदनी पत्तों में, पुनम की

उत्सुकता का पुंज, प्रभा-मंडल की द्युति भाती है
दायें पग का चूस अँगूठा, कन्या मुस्काती है

मदालसा यह चकाचौंध, यह रूप निखर कर चहक है
यह असीम सौंदर्य! अहा रे! गिरती नहीं पलक है

शिशु में यह लावण्य! तरुण वे में त्रिलोक डोलेगा
रूप-सिंधु का गर्जन, नभ के श्रुति-पट तक बोलेगा

बहुत ललक कर, बड़े यत्न से, शिशु को अंक लगाया
जग उठा मातृत्व, दुग्ध स्तन में भर-भर आया

कभी-कभी प्रभु-इक्छा से अनहोनी हो जाती है
नियति सुलगती हुई रेट में कानन बो जाती है

लौटी महलों में मदालसा, सँग नृप की थाती है
भींग गयी कंचुकी, दुग्ध की धार बही आती है
**************************************
मदालसा का अहिं कभी मातृत्व-बोध था जागा
सोचा-जो जन वंचित शिशु-सुख से, है बहुत अभागा

अहा! वक्ष से लगा असीमित पुष्कल सुख मिलता है
यह गुदगुद आनंद, प्राण का कमाल सहज खिलता है

तभी अचाक बात तड़ित-सी कौंध गयी यह मन में
‘अवहेलना हुई है मुझसे आज देव-पूजन में

नहीं देव-चरणों पर मई फल-फूल चढ़ा कुछ पाई
नहीं एनी-दिवसों की भांति भज-स्तुतियाँ गयीं

किन्तु, देव-पूजा क्या नहीं हुई सुफलित है मेरी?
धन्य हुई है क्या न प्राप्त कर शिशु यह प्रभु की चेरी?

यह पावन प्रसाद इश्वर का, सुनी कोख फली है
स्वर्ण-दीप की रजत-वर्तिका असमय आज जाली है

पूजन-वन्दन नहीं देखते प्रभु भावों के भूखे
छप्पन भोगों को झुठलाते तंदुल रूखे-सूखे

यह प्रभु का वरदान, सुकन्य बिन प्रयास पायी है
लगता है समग्र उडुगण की छटा सिमट आयी है

सच है! बिना बिचारे जो कुछ सोच-समझ लेते हैं
पछताते है और स्वयं को धोखा हीं देते हैं

वे कितनी उद्विग्न, कुचिताओं से भरी-भरी थी
बेबस थी, नृप की बंकिम भृकुटी से डरी-डरी थी

नगरवधू थी, भाग्य में मेरे माँ बनना था
क्या होता मातृत्व, जान पाना अलभ्य सपना था

नैन मुझे स्मरण, कौन थी, आई यहाँ कहाँ से
परिचय मात्र से केवल, परिचय मात्र सूरा से

नहिं स्वजन, राज्याश्रय ही बस, मात्र एक सम्बल है
अपनी एक सुनयना की माँ, अपना यमुना-जल है

क्या होती संतान नहीं सपने में भी जाना था
नृत्य, वाद्य, संगीत इन्हें ही बस, सर्वस्व मना था

इक्छा भी थी नहीं मोह-माया का जल बुनूँ मैं
जाऊँ छली काल के हांथों, सिहरूँ, शीश धुनूँ मैं

राजा का आदेश, दुखी मन से मैं वहाँ गयी थी
मेरे लिए नृपति की आज्ञा वेधक, निपट नयी थी

क्या-क्या उठे न भाव ह्रदय में कितना क्षोभ भरा था
देव-देहरी तक मेरा मन कितना मरा-मरा था

किन्तु, नियती के हाथों मेरी कोख भर गयी ऐसे
घटाटोप को चीर पूर्ण चंद्रोदय दमके जैसे’

मन ही मन न्यायी राजा के चरणों में सर नत है
बारंबार नर्तकी नृप-चरणों पर झुकी, प्रणत है

**************************************
परम तृप्ति का बोध, उमंगों का अथाह सागर है
दिन दूनी औ’ रत चौगुनी होती काँटी प्रखर है
**************************************
शुभ मुहर्त, उल्लास असीमित, यज्ञ-धूम्र छाया है
नामकरण का यह मंगल अवसर सुखमय आया है

वन-पूजन हुआ, धुधुरुओं पर अक्षत-रोली है
वासवदत्ता मदालसा की बेटी मुँह बोली है
*************************************
‘सा’ साधा –रे’ राम, गमक – ग’ की मनहर है
मदिरीला ‘म’, पुलकाकुल ’प’ अति सुन्दर है

‘ध’ की धुन प्यारी-न्यारी, ‘नि’ नित नूतन है
‘सरगम’- बोल सुहाने, विस्मित-मुग्ध भुवन है
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स्वर्ण-धुँघरुओं की मादक रन-झुन, नर्तन चलता है
दीप अखंड साधना का द्रुत निशि-वासर जलता है
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7 comments:

  1. नींव का पत्थर
    (१)

    ‘मीना बाज़ार’ के पास एक’छोटा रमना’ बाजार यहीं
    ‘चौबिस अगस्त’ को जूटते हैं थोड़े-से ‘सालाजार’ यहाँ

    आँखों में घड़ियाली आँसू
    मन में छद्मों का चक्रव्यूह
    अतिशय विचित्र जिनका चरित्र
    मकड़े के जाले-सा दुरूह

    अतिप्रातः मेहतर आता है
    मल-मूत्र उठा ले जाता है
    उलटी-सीधी झाड़ू देकर
    अपना कर्तव्य निभाता है

    है छोटे घेरे में सोया माँ-बहनों का संसार यही
    ‘मीना बाज़ार’ के पास एक’छोटा रमना’ बाजार यहीं

    (२)

    ओ “एनुल्लाह साह” के घोड़े! थम-थम कर मूतो

    यह वह भूमि जहाँ से गोरों ने गोलियाँ चलाई थीं
    आजादी पर मर-मिटने की हमने कसमें खायी थीं

    सीना तान गोलियाँ झेलीं, हँस-हँस कर कुर्बान हुए
    यही भूमि चम्पारण की ‘नौ’ अमर शहीद जवान हुए

    अरे! हया कर कुछ चौपाये! शर्म-लाज लाओ कुछ तो
    ओ “एनुल्लाह साह” के घोड़े! थम-थम कर मूतो

    ईटों पर बैठा कर मुंडन करते हैं हज्जाम यहाँ
    लावारिश कुत्ते मल-त्याग कर रहे सुबहो शाम यहाँ

    उस धरती को एक बार, बस एक बार हम चमकाते
    गाड़ तीरंगा, नौटंकी करते, न तनिक भी शरमाते

    इन सफेदपोशों पर थू है, लानत है ऐसे छलियों पर
    अमर शहीदों की स्मृति पर पुष्पांजलि जो बरसाते

    देख रही तरुणाई गुमसुम, तनिक न बाजू फड़क रहे
    जिनके पत्थर के सीनें में दिल न तनिक भी धड़क रहे

    शर्म करो ओ तरुणों! अपनी ताकत को कुछ तो पहचानो
    ओ “एनुल्लाह सह” के घोड़े! थम-थम कर मूतो
    जरा धीरे-धीरे मूतो

    इन्द्रधनुष (त्रिपथगा) पृ. ३०

    *जब कवि ने रचना को सरयाम उछाला तो बेतिया के दबंग कुम्भकर्णि निंद्रा-मुक्त हुए, और आज के शहीद स्मारक एवं नगर-भवन की नीवं पड़ी

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  2. बेटा

    बूढ़े माँ-बाप लौटे मकतब में
    सब्र का इम्तहान होता है
    कड़वे लफ्जों की मार सहते हैं
    करवटों में विहान होता हैं

    खून के कतरों से गारा साना
    तब कहीं बन सका दौलतखाना
    नाम पर कर दिया जो बेटों के
    उठ गया तब से ही पानी-दाना

    भूल जाता है माँ के आँचल को
    जिसके निचे जवान होता है
    बुढ़ापा ज़ार-ज़ार रोता है
    जिन्दा ही ला-मकान होता है


    एक बेटा ही है ज़माने में
    जिसको आकाश तक उठाने में
    बाप ने अपने को गला डाला
    बड़ी उम्मीद से पोसा-पाला

    पर यह हालत है अब बुढ़ापे में
    जवानी खोजता, झुककर कमान होता है
    अपने हाथों चिनी इमारत पर
    जलन होती नहीं, गुमान होता है

    भले ही बाप के लिये न चँद सिक्के हों
    उसके हिस्से में फकत ना-नुकुर के रुक्के हों
    अपनी मुमताज़ के लिये कमबख्त
    हीरे-पन्नों की खान होता है
    खुद तो सोता है खोल कर ए.सी.
    खाँसते बाप की खातिर बथान होता है
    १.१.२००७, हरिनगर चीनी मील
    लहरों के चिन्ह ११२

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  3. बेटी

    डोली जल्दी उठा, न कर तू देरी अरे कहार!
    सावन बन कर कहीं न बह जाये रेशमी बहार

    रोते-रोते लाल हो गये काजर कारे नैन
    हिचकी भर-भर साँसें फूलीं रुँधे सुरीले बैन
    अलग पिता ने किया वक्ष से अपने जैसे-तैसे
    बाँहों में भर लिया जननि ने, अलग करे तो कैसे

    आँखों से गंगा, स्तन से बहे दूध की धार
    डोली जल्दी उठा, न कर तू देरी अरे कहार!

    बहना सिसके, भइया बिलखे सुबकें प्यारी सखियाँ
    टोला और मुहल्ला रोये बरसे क्वाँरी अँखियाँ
    रोम-रोम रोये गलियों का, सुना आँगन सिसके
    लाली लगे चरण दो क्वाँरे चूमेगा अब किसके

    धिसी देहरी सुबक कराहे, उठा सिंधु में ज्वार
    डोली जल्दी उठा, न कर तू देरी अरे कहार!

    बेटी होती सदा परायी विवश पराया धन है
    बेटे पवि-प्रस्तर जैसे हैं बेटी एक सुमन है
    बांधों उसे वधिक के खूँटे गाय सदृश राँभेगी
    श्वसुर गेह की चौखट उसकी अर्थी ही लाँघेगी
    सुनकर कष्ट पिता-माता का भीतर तक भिंगेगी

    करवट बदल-बदल आँखों में कर देगी भिनसार
    डोली जल्दी उठा, न कर तू देरी अरे कहार!

    उसे फूल से भी मत मारो बेटा कहकर सदा उचारो
    सेवा लेनी है तो उसपर ही अपना तन-मन-धन वारो

    नैहर की नहीं, श्वशुर-गृह का भी है श्रृंगार
    डोली जल्दी उठा, न कर देर तू देरी अरे कहार!

    लहरों के चिन्ह पृ. ११४
    १४.०५.१९७०

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  4. स्वेद की सुगंध

    कविता को अपनाओ स्वेद की सुगंध में

    शब्दों के अर्थ गहो
    भावों के सिधु बहों
    रोपो धरती पर पग
    चाहे घन-पार रहो

    सुरभित सासों के संग, गरम उसाँसों का-
    उत्ताप वहन करो, वहन करो
    छुट्टा मत छोड़ो उसे, बाँधो छवि-छंद में

    एक तरफ चक्रव्यूह काशी की गलियां हैं
    और दूसरी ओर भ्रमर हैं तितलियाँ हैं
    छुट्टा तो मरखाह साँड़ फिरा करते हैं
    करुणा से सिक्त नयन-मेध धिरा करते हैं

    जब तक यह देह, बंधनों से कब मुक्ति मिली
    धरती का ॠण भी तो रमा रन्ध्र-रन्ध्र में
    कविता को पनपाओ स्वेद की सुगंध में
    छुट्टा मत छोड़ो उसे, बाँधो छवि-छंद में

    इन्द्रधनुष (त्रिपथगा) १५/ पृ. २५

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  5. मधुशाला में लोहू पीना है मना

    कीचड़ पर कीचड़ उछालना व्यर्थ है
    मिट्टी पर मिट्टी क्या रखती अर्थ है

    भूल, भूल रे भूतकाल को भूल जा
    ज्योति-ताल की इन लहरों पर झूल जा
    वर्तमान के चप्पू की गह बाँह रे
    कह दे तिमिर-पाल को उड़ जा, कूल जा
    फेंक अश्रु के तुहिनों वाले जाल को
    बुझा-बुझा इन प्रतिशोधों की ज्वाला को

    रूप-लपट से रोम-रोम झुलसा, मगर,
    शेष प्राण का नीड़ जलाना व्यर्थ है
    कीचड़ पर कीचड़ उछालना व्यर्थ है

    आँसू में इस व्यथा-सुधा को ढ़ाल दे
    शब्दों में भर करुण-कथा को, ताल दे
    मधुशाला में लोहू पीना है मना
    सारी पीर उँड़ेल सुरीले गान में
    यह काँटा तो चुभा हुआ है प्राण में

    ला पंखुड़ियाँ किसी अछूते फूल की
    काँटे से काँटा निकलना व्यर्थ है
    कीचड़ पर कीचड़ उछालना व्यर्थ है

    पारिजात के फूल पृ.५०
    १.१२.१९७४

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  6. कवि का रूप कला का दर्पण

    "यो मां पश्यति सर्वत्र सर्व च मयी पश्यतिl
    तस्याहं न प्रणश्याति स च मे न प्रणयाश्यतिll"

    पूर्ण समर्पण भाव लिये, जो भक्ति-मार्ग गहता
    अणु-चेतन में ब्याप्त्ता का अहिर्निश दर्शन करता
    सम्पूर्ण भूतों में मुझे जो व्यापक देखे
    उसके लिये हम ओझल कभी नहीं होते
    मेरे लिये वह कभी अदृश्य नहीं हो पाता
    मेरी अहेतुकी कृपादृष्टि, श्नेह सदा वह पाता
    वह सर्वथा इहलोक में सुरक्षित, प्रफुल्लित स्वयं को पाता
    अमृत-क्षरण से आप्लावित हो
    सुखमय जीवन यापन कर
    अंततः मुझमें हीं समा मुक्त हो जाता
    भावार्थ एवं प्रस्तुति: कवि
    ----------------------------------------
    हरित-क्रांति की प्रज्ज्वलित मशाल
    पिली सरसों दृष्ट, जिव-जंतु,
    समस्त विश्व संपन्न-खुशहाल,
    प्रलय का भय का त्यागे,
    प्राणी-मात्र अशुभ तुम विचार
    स्वागत करतें है दृष्ट-अगोचर,
    'ॠतु-बसंत बहार'
    माँ सरस्वती की रहे अहेतुकी कृपा,
    हो नित्य अद्भुत चमत्कार
    शुभारम्भ करो पठन-पाठन का,
    अविलम्ब प्रारंभ करो ज्ञान का विशुद्ध व्यापार
    छिन्न-भिन्न, शेष हो,
    वसुंधरा में व्याप्त तिमिर-अन्धकार
    शुभ-एषणा हो मात्र,
    मानवता की ग्रीवा में हो विजय-हार
    सद्-विप्र जीवन का यह पूर्वाभास,
    विश्व-बंधुत्व का प्रबल आधार
    जड़-चेतन का हो संस्कार-क्षय शीघ्र,
    खुल जाये मुक्ति-द्वार
    शत्रु-मित्र खाएं नित्य प्रीति-भोज,
    समस्त विश्व रह जाये दंग
    मेरी करबद्ध विनती दिवि-निशि,
    मित्रों से बारम्बार...
    त्याग करो द्वेष, ध्रिणा,
    हिंसा-प्रतिहिंसा का अशुभ विचार....
    ---------------------------------------

    मेरे प्रिय कान्हा!
    तेरी मुरलिया की तान का तेज़ ज़ादू,
    मुझे खींच-खींच क्यूँ लाता है?
    दिन-दुनिया से अलग-थलग कर,
    कानन की ओर मेरे पग,
    स्वतः बढ़ जाते हैं!
    स्वप्निल दुनिया,
    समक्ष, साकार हो,
    मधुमत्त किये जाती है!!
    मेरी छाछ की गगरिया,
    छलक-छलक क्यूँ यूँ इतराती है?
    स्नेह-पाश में बंध,
    अलौकिक सुख क्यूँ मिलता है?
    आनन-फ़ानन में,
    सुरभि-सुमन पल्लवित हो गदराते है!
    मिलन-पिपासा मिलने पर त्वरित,
    उग्र और क्यों हो जाती है?
    अहेतुकी कृपा-दृष्टि पा कर,
    क्यूँ तृष्णा विचिलित हिया दुखती है
    ~कवि
    --------------------------------

    ब्राह्म-मुह्रत के दुर्लभ क्षण, चित्त अत्यंत अस्त-व्यस्त था!
    तन्द्रा की धुंध, मुखारविंद अराध्य का, सम्मुख था!!
    ज्योत्स्ना हृद्यांचन को आलोकित कर स्फुटित करती थी,
    अग्रिम हीं, दिन-चर्या का प्रतिवेदना समक्ष थी!
    लोकाचार यह है, अत्यंत विचित्र है बिधना,
    मन विक्षिप्त, विचार-शून्य एवं व्यथा-मुक्त!!
    क्यों ऐसा प्रतिदिन होता है?
    गोधुली का आह्वान होते हीं,
    थकित-थकित मन क्यूँ विह्वल!
    आकुल-व्याकुल, अश्रु-पूरित होता है??
    -----------------------------------------------

    "सृष्टि-रहस्य"
    ‘महाशुन्य’ ‘ब्रह्म-एषणा’ की छद्म अभिव्यक्ति!
    व्यष्टि में लुप्त हुई समस्त अव्यक्त समिष्टि!!
    धूम्र-वर्ण निहारिका, अपार व्योम दृष्टव्य सारा!
    चकाचौंध करते तारे, अति-सुन्दर पुष्छल तारा!!
    धूम्रकेतु, सप्त-ॠषि,
    अतुल सृष्टि का मनमोहक भण्डारण!
    सौर्य-मंडल मात्र एक अंश, सकुंचित!
    अणु-चेतन व्यक्त-अव्यक्त प्रकुंचन-विस्तारण!!
    अदृष्ट तरंगे व्याप्त चराचर,
    ब्रह्माण्ड की अद्भुत यह विशाल रचना!
    क्लिष्ट बहुत,
    पठन-पाठन मात्र एक स्वप्न अपना!!
    उस अनंत का यह मंडल-समूह,
    वसुंधरा का जल-थल-नभ का विस्तारण!
    प्रभु का अदृश्य अव्यक्त, आमन्त्रण!!
    सृष्टि के नियम, स्वतः नियंत्रित
    सुकृत हो या विकृत,
    ब्रह्म-भाव के अभिमंत्रित;
    पञ्च-तत्व से मानव रचना!
    मन की परिधि, अपार,
    आश्चर्यजनक यह बिधना!!
    संस्कार अर्जित, क्षय की यह रचना!!!
    कर्म, प्रारब्ध समस्त निश्चित!
    सृष्ट-जगत संभव, हो कुपित!!
    महाविनाश का भय करता विचलित!
    चिंता की गति, क्यों ना हो त्वरित!!
    सम्मोहन, उच्चाटन, वैराग्य अनूठा!
    किंकर्तव्यविमूढ़ मानव मन अंगीभूत करे पूजन-पथ!!
    महासम्भूति का सामयिक मार्ग-दर्शन!
    सत्य नहीं किंवा, है मिथ्या, असंभव ब्रह्म-अवतरण!!
    शूक्ष्म-स्थुल का अविराम चिंतन!
    सृष्ट-जीव अणु-परमाणु का मात्र कायांतरण,
    अवतरित होता संयुक्त अणु-चेतन!!
    आसक्ति-विरक्ति का अस्पष्ट अंतर्द्वंद्व!
    आदि-अंत का रहस्य ज्ञान-विज्ञान की अनंत अभिलाषा!!
    बुद्धिजीवी की अंतिम जिज्ञासा की प्रबल आशा!!!
    आत्म-उत्सर्जन, कायांतरण का वृहत अभेद्य चक्र!
    मस्तिस्क सिमित, मार्ग सहज नहीं अत्यंत बक्र!!
    झंझावात का उग्र-दंभ हुआ दृष्टिगत्!
    बड़वानल की भीषण-अग्नि समन का भ्रम!!
    सम्पूर्ण अस्तित्व हुआ आत्मसात्!
    अप्राप्य ज्ञान प्राप्य, भविष्य में संभव!!
    प्रभु-चरण में कर पूर्ण-आत्म-समर्पण!
    क्लिष्ठ सत्य, सुलभ बन हो मुक्त,
    जीव-मनसा हो जाये पूर्ण!!
    आत्मा-परमात्मा का यह अद्भुत मिलन!
    संकट-मोचन साक्ष्य,
    मोक्ष-द्वार का संभव शुभ-चिंतन!!
    ~कवि

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  7. दंभ नहीं, अन्तिरिम विद्रोह है ये
    इन्कलाब की बुलंद चीत्कार है ये
    युद्ध-भूमि की बहती रक्त-धार है ये
    प्रतिशोध-ज्वाल, हाहाकार है ये
    स्वतंत्रत-भारत के पार्थ-सारथि,
    अग्नि-पथ का अग्रिम, सुभाष है ये
    टीपू की रक्त-सनी तरवार है ये
    भगत सिंह की भीषण हुंकार है ये
    स्वतंत्रता हेतु, अविरल संग्राम है ये
    देश के भविष्य की पुष्ट ढ़ाल है ये
    शोषण-पीड़ा -त्याग पीड़ी याद करेगी
    श्रद्धा-सुमन अश्रु-पूरित अर्पित नित्य करेगी
    ~कवि

    --------------------------------
    लहरों पर अडिग, पुष्ट हिचकोले खाती!
    अनश्वर प्रीत की अमर कथा सुनाती!!
    चन्द्रमा के अदम्य आकर्षण से आबद्ध,
    स्नेह से बिनति करता निशि-दिन, कर-बद्ध!
    प्रगाढ़ आलिंगन की महत् एषणा का ये अविरल हठ,
    क्षितिज -तल से करतल प्रतिध्वनी चाहुदिशी परावर्तित,
    ‘हृदय आकुल-व्याकुल, शीध्र आगमन है, मात्र अभिष्ठ!!
    ~कवि
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    महाभारत का पार्थ-सारथि नहीं,
    हमें तो ब्रज का कृष्ण चाहिये!
    राधा-भाव में मस्त मित्रों का,
    साथ, लय-धुन-ताल चाहिए!!
    प्रेम की डोर तन कर
    टूटी नहीं है कभी!
    युद्ध-प्रतिस्पर्धा का अंत,
    नहीं हुआ है कभी!!
    अंत युद्ध का, हमें दीर्घ-विश्राम चाहिये!
    प्रेम-सरिता में आप्लावित, प्यार चाहिए!!
    दानव का अट्टहास नही, प्रभु की मुस्कान चाहिये!
    प्रेम-पथिक मेरे, मुझे नव-जीवन का दान चाहिए!!
    -----------------------------------------------------

    चाँदी-सोना नहीं,
    मुझे अश्रु-धार चाहिये!
    पुष्प-माल नहीं,
    मुझे भक्ति-प्यार चाहिए!!
    जाना नहीं तुझे तीर्थ-मज़ार,
    दिल में मेरा बस, ख़्याल चाहिए!
    भगवान्-ख़ुदा हु तेरा,
    तेरे निर्मल हृद्यांचल में,
    अनंत-विश्राम चाहिए!!
    -------------------------

    देश-द्रोहियों मुझे ना छूना,
    भारत माँ के हाथों का श्रृंगार हूँ मैं!
    तिरंगा ध्वज मैं, शांति प्रतिक,
    शत्रुओं का विनाश-महाकाल हूँ मैं!!
    शहीदों के रक्त से सिंचित,
    अविरल संग्राम हूँ मैं!
    अग्नि-वाण;मर्यादा मेरी हुई भंग अगर,
    ज़ंजीरों में ज़कड़ मर-ख़प जाओगे!!
    त्राहिमाम-त्राहिमाम तुम कब तक फिर चिल्लाओगे?
    -------------------------------------------------------

    “ज्ञान, प्रेम, धर्म, समर्पण एवं धैर्य को गहो!
    जीवन का परम-लक्ष्य है यह,
    प्रशस्त-पुण्य पथ के पथिक बनो!!
    दिग्-दिगंत में स्वर्णिम आभा भरो!!!”
    कृष्ण ने द्रौपदी को जब यह बतलाया,
    विछिप्त कन्या हुई सहज,
    द्रुपद का 'अहम्' पछताया!!
    कृष्ण ने सत्य-मार्ग दिखया!
    सास्वत-सत्य से सबको अवगत करवाया!!
    ~कवि

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