आज अमरत पीला दो ऐ मेरे सनम।
इंतजार कर रहा, बीते कई जनम।
जहर पी मुकम्मिल रे पचा डाला,
अस्क देख दिल न डोलता सनम।।
ख़्वाबों में नहीं,
ख़्वाजा की दरगाह चल।
है सामने तो हाथ रहा है मल।
पनाह आगोश की ले,
दीवार कहाँ?
लम्हा लम्हा गुजरा,
बहाना- आज नहीं कल।।
डस लिया नागन, क्या करूँ?
मत खोलता आगल, दवा कहूँ?
कहानी कह न फुसला,
गहरा असर चाहिये।
जुवानी न और सुना,
सचमुच कजा चाहिये।।
डॉ. कवि कुमार निर्मल